मेरा परिंदा

फिर से उड़ चला मेरा परिंदा, लेकर मान मे आस
ढूंढता हुआ अपना आशियाना, जहाँ प्रीत हो उसके पास

सब के मान को जीत लिया पर अपना मान है उदास
दिल भी उसका टूटा लेकिन हुई ना कोई आवाज़

दुनियादारी जाने है पर दिल उसका नादान
चाहे अपने जैसा ही हो, ये सारा ब्रह्मांड

अपनी चाहत साथ लिए और लेकर मान मे आस,
फिर से उड़ चला मेरा परिंदा, पंख उसके विश्वास

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